आजमगढ़: इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें सिर्फ कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि सीने को चीरकर रख देती हैं। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के सगड़ी तहसील अंतर्गत नत्थूपुर गांव के लाल, कारगिल युद्ध के अमर शहीद रामसमुझ यादव की कहानी कुछ ऐसी ही है—एक ऐसा खौफनाक और हैरान कर देने वाला इत्तेफाक, जिसे सुनकर आज भी हर देशवासी का गला भर आता है। 30 अगस्त 1977 को एक साधारण किसान के घर जिस बेटे की किलकारियों से घर-आंगन गूंजा था, ठीक 22 साल बाद 30 अगस्त 1999 को उसी दिन उनकी शहादत की खबर ने पूरे देश को हिला कर रख दिया।
संघर्षों की भट्टी में तपा बचपन और पढ़ाई का जज्बा
शहीद रामसमुझ यादव का बचपन भारी संघर्षों में बीता। उनके पिता राजनाथ यादव एक मामूली मैकेनिक थे और मां प्रतापी देवी ग्रहणी थीं, जिनका परिवार बेहद तंगहाली में जीवन बिता रहा था। मौलाना आजाद इंटर कॉलेज अनजान शहीद में पढ़ाई के दौरान किताबों, फीस और बहन की दवाइयों का खर्च उठाने के लिए वे रविवार को कॉलेज की इमारत निर्माण के दौरान मजदूरी करते थे। एक बार स्कूल के प्रिंसिपल द्वारा पूछताछ किए जाने पर जब रामसमुझ की आंखों से आंसू छलक आए और सच्चाई सामने आई, तो यह साफ हो गया कि वह मासूम छात्र संघर्षों से तपकर फौलाद बन रहा था।
बीमारी में भी अदम्य साहस: कारगिल का वह मोर्चा
वर्ष 1996 में रामसमुझ यादव ने भारतीय सेना की 13 कुमाऊं रेजिमेंट ज्वाइन की। वर्ष 1999 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान वे सियाचिन से कारगिल के सबसे खतरनाक मोर्चे पर तैनात थे। साथियों के मुताबिक, शहादत के वक्त उन्हें तेज बुखार था, बावजूद इसके उन्होंने पीछे हटने से साफ इंकार कर दिया और कहा—"अगर मैं आज नहीं लड़ा, तो मेरी मां क्या कहेगी?" मातृभूमि के लिए लड़ते हुए उन्होंने 30 अगस्त 1999 को अपने जन्मदिन के ही दिन सर्वोच्च बलिदान दिया। इत्तेफाक देखिए कि जिस दिन उनकी किलकारी गूंजी थी, ठीक उसी दिन उनकी अर्थी घर पहुंची।
संघर्ष से स्वावलंबन तक की मिसाल
शहादत के बाद सरकार द्वारा परिवार को दी गई गैस एजेंसी को उनके छोटे भाई प्रमोद यादव ने संभाला। जो परिवार कभी अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए ईंटें और पत्थर उठाया करता था, आज वही परिवार समाज को रोजगार देने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों को शहीदों की वीरता की कहानियां पढ़ा रहा है।
बहनों का अटूट प्रेम: शहादत की प्रतिमा को बांधी राखी
28 अगस्त की शाम गांव की महिलाओं और बहनों ने वीर शहीद रामसमुझ यादव की प्रतिमा की कलाई में राखी बांधी, उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया। इसके पश्चात छोटे भाई प्रमोद यादव ने सभी बहनों का आभार व्यक्त करते हुए उन्हें मिठाई खिलाई और उपहार भेंट किए। यह भावुक पल इस बात की गवाही देता है कि देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले अमर शहीद कभी नहीं मरते, बल्कि वे पूरे गांव और समाज के भाई-बेटे बन जाते हैं।
पूर्वांचल का विख्यात शहीद मेला: 26 सालों से जल रही है शौर्य की मशाल
यह मेला सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे पूर्वांचल के लिए शौर्य, प्रेरणा और देशभक्ति का एक ऐसा महाकुंभ बन चुका है, जिसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती है। पिछले 26 सालों से लगातार हर साल आयोजित होने वाला यह भव्य शहीद मेला इस बात का जीवंत प्रमाण है कि अपनों को खोने का दर्द चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, लेकिन देश के लिए मिटने वालों की यादें कभी धूमिल नहीं होतीं। शहीद रामसमुझ यादव के छोटे भाई प्रमोद यादव हर साल इस मेले की कमान संभालते हैं और अपनी असीम निष्ठा व वर्दी के प्रति सम्मान के साथ इस परंपरा को पीढ़ियों तक जीवित रखे हुए हैं। उनकी इसी जिद और देशप्रेम का नतीजा है कि आज नत्थूपुर की यह माटी देश भर के वीर सपूतों और दिग्गजों के मिलने का बड़ा केंद्र बन जाती है।
शहीद मेला 2026: भव्य आयोजन की रूपरेखा
वीर शहीद रामसमुझ यादव के जन्मदिन और शहादत दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित होने जा रहे इस ऐतिहासिक शहीद मेला 2026 का विवरण इस प्रकार है: 30 अगस्त 2026, नत्थूपुर (निकट अनजान शहीद बाज़ार), आजमगढ़।
- मुख्य अतिथि: जनरल वेद प्रकाश मलिक जी (कारगिल युद्ध के तत्कालीन सेनाध्यक्ष / आर्मी चीफ) धर्मेंद्र यादव जी (सांसद आजमगढ़) होगे वहीं विशिष्ट अतिथि: वीर नायक दीपचंद जी (कारगिल योद्धा) इस कार्यक्रम में खुशी कक्कड़ (भोजपुरी गायिका) समर सिंह (भोजपुरी गायक) की प्रस्तुति होगी। कार्यक्रम के संयोजक: राजनाथ यादव (पिता), श्रीमती प्रतापी देवी (माता) है
- प्रमोद यादव शहीद रामसमुख यादव के छोटे भाई जिन्होंने ने कार्यक्रम की जानकारी देते हुए लोगो से इस शहीद मेले में शामिल होने की अपील की है।