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See: Iftekhar Azmi is tying Rakhi to martyr's sisters

एक भाई का फर्ज जो 27 सालों से नहीं बदला: शहीद रमेश यादव की बहनों से राखी बंधवा रहे इफ़्तेख़ार आजमी

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| | 👁️ 19 | 📍 सगड़ी

आजमगढ़ के इफ्तेखार आजमी वर्ष 1999 में शहीद हुए रमेश यादव की बहनों को पिछले 27 सालों से लगातार रक्षाबंधन पर राखी बंधवा रहे हैं और हर सुख-दुख में साथ खड़े हैं। मजहब की दीवारों से ऊपर उठकर निभाया जा रहा यह अटूट रिश्ता हमारी 'गंगा-जमुनी तहजीब' और इंसानियत की एक अनूठी मिसाल पेश करता है।

सरहद पर देश के लिए जान कुर्बान करने वाले वीर सपूतों की शहादत के बाद अक्सर वक्त के साथ सूने घर और वीरान गलियां सबकी यादों से ओझल हो जाती हैं, लेकिन आजमगढ़ के सगड़ी तहसील क्षेत्र के नत्थू पुर गांव में एक ऐसी दास्तान जिंदा है जो इंसानियत और भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की ऐसी इबारत लिखती है, जिसकी गूंज पूरे जनपद में है।

​वर्ष 1999 में देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए रमेश यादव के घर का इकलौता चिराग बुझ गया था। माता-पिता की इकलौती संतान रमेश के जाने के बाद परिवार पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा कि उनकी बहनों शशिकला और चंद्रकला की दुनिया उजड़ सी गई। घर में कोई भाई नहीं बचा, सू सूनी सूनी कलाइयों पर रक्षाबंधन का धागा बांधने की आस हमेशा के लिए टूट चुकी थी।

​ऐसे में समाजसेवी और नवोदय विद्यालय के कर्मचारी इफ्तेखार आजमी ने उस बिखरे हुए परिवार को अपनी छाती से लगा लिया। उन्होंने सिर्फ एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं निभाई, बल्कि खुद को रमेश की जगह रखकर दोनों बहनों का ऐसा भाई बन गए, जिसने पिछले 27 सालों से इस रिश्ते की डोर को एक पल के लिए भी कमजोर नहीं होने दिया।

​शुक्रवार की सुबह ठीक 9:00 बजे जब इफ्तेखार आजमी नत्थू पुर गांव स्थित शहीद रमेश यादव के घर पहुंचे, तो वह सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि दो दशकों से अधिक समय से चली आ रही एक अटूट परंपरा का सजीव रूप था। बहनों शशिकला और चंद्रकला ने नम आंखों और गर्व से भरी छाती के साथ अपने भाई इफ्तेखार की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। भाई ने भी बहनों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और उन्हें उपहार भेंट किए।

​यह सिलसिला सिर्फ रक्षाबंधन तक सीमित नहीं है। मकर संक्रांति का पावन पर्व हो या घर का कोई अन्य सुख-दुख, इफ्तेखार आजमी हर घड़ी इस शहीद परिवार के ढाल बनकर खड़े रहते हैं। पिछले 27 वर्षों से मकर संक्रांति पर दोनों बहनों के घर खिचड़ी पहुंचाने की परंपरा को उन्होंने कभी नहीं टूटने दिया।

​शहीद रमेश यादव की बहनों को आज भी इस बात का मलाल नहीं है कि उनका अपना भाई इस दुनिया में नहीं है, क्योंकि उन्हें समाज के बीच एक ऐसा भाई मिल गया है जिसने खून के रिश्ते से बढ़कर इस फर्ज को निभाया है। इफ्तेखार आजमी का यह पवित्र और अनुकरणीय कार्य आज पूरे आजमगढ़ के लिए भाईचारे और संवेदना की सबसे बड़ी मिसाल बन चुका है, जिसकी चर्चा हर जुबान पर है।

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