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Photo: Life at stake in flood at Belhiya Dhala: Minors hold the rudder of the boat, administration silent

बेलहिया ढाला पर बाढ़ में जिंदगी दांव पर: नाबालिगों के हाथ में नाव की पतवार, प्रशासन मौन

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| | 👁️ 6 | 📍 Azamgarh

एक लाइन सारांश: बेलहिया ढाला पर बाढ़ के बीच नाबालिग बच्चों के हाथ में नाव की पतवार और बिना लाइफ जैकेट यात्रियों की आवाजाही ने प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आजमगढ़ सरयू नदी का जलस्तर भले ही खतरा बिंदु से नीचे आ गया हो, लेकिन सगड़ी तहसील के उत्तरी इलाके में बाढ़ का कहर अभी भी बरकरार है। महुला-गढ़वल बांध के उत्तर दिशा में दर्जनों गांवों का संपर्क टूटा हुआ है। सड़कें अभी भी 2से 3फीट पानी में डूबी हैं। ऐसे में बेलहिया ढाला ग्रामीणों के लिए लाइफ लाइन बना हुआ है। लेकिन इसी लाइफ लाइन पर सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है। बेलहिया ढाला पर चल रही चार नावों की जो तस्वीरें और वीडियो सामने आई हैं, उसने प्रशासन की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि 12 से 15 साल के नाबालिग बच्चे नाव की कमान संभाले हुए हैं। नाव में 8 से 10 यात्री, जिनमें महिलाएं, छोटे बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं, जान जोखिम में डालकर सफर कर रहे हैं। किसी के पास लाइफ जैकेट तक नहीं है। दोहरा उल्लंघन - सुरक्षा और बाल श्रम यह मामला दोहरा उल्लंघन है। पहला, बाढ़ जैसी आपदा में बिना प्रशिक्षित नाविक, बिना सुरक्षा उपकरण के यात्रियों की जान से खिलवाड़। दूसरा, नाबालिग बच्चों से इस तरह का जोखिम भरा काम कराना, जो सीधे तौर पर बाल श्रम निषेध अधिनियम के दायरे में आता है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने नाव तो लगवा दी, लेकिन निगरानी भगवान भरोसे छोड़ दी। सवाल उठता है कि क्या इन नाबालिग नाविकों का कोई लाइसेंस है? क्या उन्हें आपदा में नाव चलाने का प्रशिक्षण दिया गया है? यदि बीच धारा में नाव पलटती है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? लेखपाल का फोन बंद, पुलिस के सामने चल रही नावें सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह सब रौनापार थाने से महज कुछ कदम की दूरी पर हो रहा है। थाने के पुलिस के सामने ही नाबालिग बच्चे सवारियों को नदी पार करा रहे हैं। इस संबंध में क्षेत्रीय लेखपाल और बाढ़ चौकी प्रभारी से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका फोन रिसीव नहीं हुआ। ग्रामीणों ने बताया कि मजबूरी में नाव पर बैठना पड़ रहा है, लेकिन बच्चों के हाथ में नाव देखकर डर लगता है। मजबूरी अपनी जगह है, लेकिन प्रशासन को यात्रियों की सुरक्षा और बच्चों के भविष्य दोनों को देखना होगा।

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