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एक ईंट, एक धोती और आजादी का जुनून: आजमगढ़ के ‘विदेशी’ यादव ने अंग्रेजों को ऐसे दी थी चुनौती
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|📅 09 Aug 2026, 09:18 AM|👁️ 85|📍 सगड़ी
अगस्त क्रांति के नायक विदेशी यादव ने अंग्रेजी हुकूमत को ईंट, संघर्ष और धोती की रस्सी से चुनौती देकर आजादी की लड़ाई में अदम्य साहस की मिसाल कायम की।
आज़ादी की लड़ाई सिर्फ किताबों में दर्ज नामों तक सीमित नहीं थी। यह उन गुमनाम ज्वालामुखियों की भी कहानी है, जो अंग्रेजी हुकूमत के सीने पर धधकते रहे। इतिहास की मुख्यधारा में भले ही उनके नाम बहुत बड़े अक्षरों में दर्ज न हुए हों, लेकिन उनकी चिंगारी आज भी आजमगढ़ की मिट्टी में जिंदा है।यह कहानी है सगड़ी तहसील के बेरमा गांव में जन्मे स्वतंत्रता सेनानी विदेशी यादव की—एक ऐसे योद्धा की, जिसके लिए अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकना विकल्प ही नहीं था।1 जुलाई 1897 को जन्मे विदेशी यादव के पिता का नाम सूचित यादव था। परिवार द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, बचपन से ही उनका शरीर सुगठित, व्यक्तित्व तेज-तर्रार और स्वभाव बेहद स्वाभिमानी था। देश और समाज के प्रति उनका झुकाव उन्हें धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन की ओर ले गया। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के दौर में वह अंग्रेजी शासन के खिलाफ सक्रिय होने लगे।उनके पुत्र और सेवानिवृत्त शिक्षक कल्पनाथ यादव आज भी पिता की यादों को अपने शब्दों में जीवित रखते हैं। वह कहते हैं—
"विदेशी वीर पुरुष थे, कायर नहीं। वे देश पर मरना सीखे थे, हम रहें या न रहें, इस गर्व से जीना सीखे थे।"
यह सिर्फ एक बेटे की अपने पिता के लिए कही गई पंक्ति नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के जज्बे का आईना है जिसने आजादी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। विदेशी यादव फाइल फोटो पहली चिंगारी: जब दरोगा के हंटर ने जगा दिया बगावत का ज्वालामुखी साल था 1934। विदेशी यादव की गतिविधियों पर अंग्रेजी पुलिस की नजर थी। एक दिन पुलिस टीम उनके घर पहुंची। तलाशी के दौरान पुलिस और विदेशी यादव के बीच विवाद बढ़ गया। परिवार से मिली स्मृतियों और उपलब्ध दस्तावेजों में इस घटना का उल्लेख बेहद रोचक तरीके से मिलता है। बताया जाता है कि पुलिस ने उन पर हमला किया और गर्दन के पीछे हंटर से वार किया। चोट इतनी गंभीर थी कि वह घायल हो गए। लेकिन पुलिस को शायद अंदाजा नहीं था कि जिस व्यक्ति पर हाथ उठाया गया है, वह आसानी से हार मानने वाला नहीं है।घायल होने के बावजूद विदेशी यादव ने प्रतिरोध किया। परिवार के अनुसार उन्होंने कुश्ती का ‘धोबिया पाट’ दांव लगाकर दरोगा को जमीन पर पटक दिया और फिर घूंसे-कोहनियों से जवाब दिया। दरोगा को पटककर सीने पर चढ़ गए अपने हाथ की अंगुलियों उसके मुंह में डालकर उसका जबड़ा फाड़ दिया।स्थिति संभालने के लिए पुलिसकर्मियों को बाहर किए से रस्सी लाकर उन्हें बांधकर काबू करना पड़ा। उधर दरोगा जबड़ा फटने के कारण लहूलुहान दर्द से तड़प रहा था उसके मुंह से आवाज नहीं निकल पर रही थी तो उसने अपनी जेब से कागज और कलम निकाला और लिखकर कहा कि विदेशी को छोड़ो पहले मुझे अस्पताल ले चलो। इस घटना ने अंग्रेजी पुलिस को साफ संकेत दे दिया था—यह आदमी डरकर पीछे हटने वाला नहीं है। 1942: ‘करो या मरो’ ने विदेशी यादव के भीतर की आग को और भड़का दिया फिर आया साल 1942। महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ ‘करो या मरो’ का आह्वान किया और पूरे देश में अगस्त क्रांति की आग फैल गई। आजमगढ़ भी इस आंदोलन से अछूता नहीं रहा। विदेशी यादव एक बार फिर अपने साथियों के साथ आंदोलन में कूद पड़े। अंग्रेजों की संचार व्यवस्था को बनाया निशाना उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार 10 अगस्त 1942 की रात विदेशी यादव अपने साथियों के साथ निकले। उनका उद्देश्य अंग्रेजी शासन की संचार व्यवस्था को बाधित करना था। उस समय सठियांव रेलवे स्टेशन से गोरखपुर को टेलीफोन लाइन जोड़ती थी। विद्रोहियों ने समुद्रपुर से बसापुर बनकट तक टेलीफोन की तारें और पांच खंभे उखाड़ दिए तथा संचार व्यवस्था को बाधित कर दिया। तारों और खंभों को चांदपार के कुएं में ले जाकर डाल दिया। यह मामूली कार्रवाई नहीं थी। उस दौर में टेलीफोन लाइनें अंग्रेजी प्रशासन के लिए पुलिस और अधिकारियों के बीच संपर्क का महत्वपूर्ण साधन थीं।संचार टूटने का मतलब था—सरकारी मशीनरी के बीच खबरों का प्रवाह रोक देना। विदेशी यादव और उनके साथी जानते थे कि अंग्रेजी शासन की ताकत सिर्फ बंदूकों में नहीं, बल्कि उसके मजबूत प्रशासनिक नेटवर्क में भी थी। इसलिए उस नेटवर्क पर चोट करना भी आजादी की लड़ाई का हिस्सा था। मधुबन थाना: तिरंगे के लिए चली गोलियां अगस्त क्रांति के दौरान 16 अगस्त 1942 को मधुबन थाना आंदोलन का बड़ा केंद्र बना। क्रांतिकारी थाने पर तिरंगा फहराने के लिए पहुंचे। अंग्रेजी प्रशासन ने आंदोलनकारियों को रोकने के लिए बल प्रयोग किया। स्थिति देखते ही देखते संघर्ष में बदल गई। इस कार्रवाई में रामभजन पांडेय समेत 13 क्रांतिकारियों के शहीद होने का उल्लेख उपलब्ध दस्तावेजों में मिलता है।यहीं विदेशी यादव की बहादुरी से जुड़ी एक घटना परिवार की स्मृतियों में बेहद खास है। बताया जाता है कि पुलिस की ओर से गोलियां चल रही थीं। इसी बीच एक हाशिम नाम का सिपाही थाने की छत के ऊपर से गोली चला रहा था। विदेशी यादव की नजर उस पर पड़ी। उनके हाथ में बंदूक नहीं थी। हथियार के नाम पर सिर्फ एक ईंट थी। उन्होंने जमीन से ईंट उठाई और पूरी ताकत से सिपाही की ओर फेंकी। परिवार के अनुसार ईंट सिपाही को लगी और वह नीचे गिर पड़ा। इसके बाद पुलिस बल में अफरातफरी की स्थिति बन गई। यह घटना भले ही आज सुनने में अविश्वसनीय लगे, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी पारिवारिक स्मृतियों में यह प्रसंग आज भी जीवित है। जिस लड़ाई में सामने बंदूकें हों और हाथ में सिर्फ ईंट—वहां हथियार से ज्यादा मायने रखता है हौसला। अंग्रेजों ने कसा कानून का शिकंजा अगस्त क्रांति की गतिविधियों के बाद विदेशी यादव को गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजी सरकार ने उन पर डीआईआर की धारा 35 के तहत कार्रवाई की। मुकदमा चला और उन्हें दो वर्ष के कठोर कारावास, 15 बेंत तथा 15 रुपये जुर्माने की सजा दी गई। लेकिन जेल और सजा भी उनके इरादे को नहीं तोड़ सकी। उपलब्ध विवरण में यह भी उल्लेख मिलता है कि मुकदमे के दौरान सरकारी पक्ष के एक गवाह के साथ विवाद हुआ, जिसके बाद उसके खिलाफ भी कार्रवाई हुई।अंग्रेजी शासन शायद यह मान रहा था कि बेंत और जेल की सलाखें विदेशी यादव की आवाज दबा देंगी। लेकिन जिस व्यक्ति ने पुलिस के हंटर का जवाब अपने हाथों से दिया हो, उसके लिए जेल की दीवारें कितनी बड़ी चुनौती हो सकती थीं? जब धोती बनी आजादी की रस्सी और फिर आई वह घटना जो विदेशी यादव के जीवन की सबसे रोमांचक घटनाओं में गिनी जाती है। 10 नवंबर 1942—आजमगढ़ जिला जेल। विदेशी यादव जेल में बंद थे। उनके साथ कई अन्य कैदी भी थे। जेल की ऊंची दीवार बाहर निकलने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा थी। लेकिन क्रांतिकारियों ने रास्ता खोज लिया। धोती को फाड़कर रस्सी बनाई गई। उसी रस्सी के सहारे कैदियों ने जेल की दीवार पार करने की योजना बनाई। उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार 14 कैदी जेल से फरार होने में सफल हुए। एक तरफ अंग्रेजों की बंदूकें थीं, दूसरी तरफ जेल की ऊंची दीवारें और बीच में एक साधारण सी धोती। लेकिन उस धोती में आजादी का ऐसा जुनून बंधा था कि वह रस्सी बन गई। जेल से कैदियों के भागने के बाद अंग्रेजी प्रशासन में हड़कंप मच गया। दस्तावेज में जेल कर्मचारियों पर कार्रवाई और जेल की दीवारों को और ऊंचा किए जाने का उल्लेख भी मिलता है। आज भी आजमगढ़ की पुरानी जेल इसका प्रमाण है। यानी अंग्रेजों ने दीवार ऊंची कर दी, लेकिन विदेशी यादव के हौसले की ऊंचाई नहीं नाप सके। जेल से निकलकर भी संघर्ष जारी रहा जेल से फरारी उनके संघर्ष का अंत नहीं थी। विदेशी यादव अंग्रेजी शासन के खिलाफ सक्रिय रहे। बाद में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया और जेल भेजा गया। उपलब्ध दस्तावेज में उनके रायबरेली जेल भेजे जाने तथा वहां से 29 अक्टूबर 1943 को रिहा होने का उल्लेख मिलता है। इस पूरे दौर में उनका जीवन लगातार संघर्ष, गिरफ्तारी और अंग्रेजी दमन के बीच गुजरता रहा।
भारत सरकार द्वारा दिया गया तांब्रपत्र आजादी के बाद भी गरीबों की लड़ाई 1947 में देश आजाद हुआ। लेकिन विदेशी यादव के लिए संघर्ष की भावना खत्म नहीं हुई। परिवार के अनुसार उन्होंने आजादी के बाद भी गरीबों और कमजोर लोगों के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। अंग्रेज चले गए थे, लेकिन उनके भीतर अन्याय के खिलाफ लड़ने वाला वही आदमी मौजूद था। उन्हें बाद में स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता भी मिली। परिवार के अनुसार 1983 में उन्हें स्वतंत्रता सेनानी प्रमाणपत्र मिला और पेंशन भी शुरू हुई।
लेकिन उनकी स्मृतियों को स्थायी पहचान देने के लिए उनके नाम पर न कोई बड़ा स्मारक बना और न ही कोई सड़क उनके नाम हुई।
23 जुलाई 2000 को विदेशी यादव का निधन हो गया।
एक ऐसा आदमी चला गया जिसने अपने जीवन में अंग्रेजी शासन की लाठियां खाईं, पुलिस से भिड़ा, संचार व्यवस्था को चुनौती दी, मधुबन की गोलियों के बीच तिरंगे के लिए खड़ा हुआ और जेल की दीवारों को धोती की रस्सी से चुनौती दे दी।
इतिहास के पन्नों से ज्यादा जरूरी है ऐसी कहानियों को बचाए रखना विदेशी यादव की कहानी केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब गांव का एक आदमी भी साम्राज्य की ताकत को चुनौती देने का साहस रखता था।
एक तरफ अंग्रेजी हुकूमत की बंदूकें थीं, दूसरी तरफ एक ईंट। एक तरफ जेल की ऊंची दीवारें थीं, दूसरी तरफ धोती की रस्सी। एक तरफ हंटर था, दूसरी तरफ न झुकने वाला स्वाभिमान। और शायद यही विदेशी यादव की सबसे बड़ी पहचान थी। उनके पुत्र कल्पनाथ यादव के शब्दों में—
“विदेशी वीर पुरुष थे, कायर नहीं। वे देश पर मरना सीखे थे, हम रहें या न रहें, इस गर्व से जीना सीखे थे।”
आज जरूरत है कि बेरमा गांव के इस योद्धा की कहानी सिर्फ परिवार की स्मृतियों या पुराने कागजों तक सीमित न रहे। क्योंकि आजादी का इतिहास केवल उन लोगों का नहीं है जिनके नाम हर किताब में छपे हैं। आजादी उन विदेशी यादव जैसे अनगिनत लोगों की भी विरासत है, जिन्होंने अपने हिस्से की जिंदगी लड़ते हुए गुजार दी, ताकि आने वाली पीढ़ियां आजाद हवा में सांस ले सकें।
जितेंद्र यादव | संपादक द पब्लिक एक्सप्रेस
जितेंद्र यादव पिछले 15 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों के लिए काम करते हुए जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग की है। स्थानीय मुद्दों, जनसमस्याओं, राजनीति, प्रशासन और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरों को करीब से कवर करने का उनका लंबा अनुभव है। उनका मानना है कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर पहुंचाना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक तस्वीर सामने रखना और जनता की आवाज को जिम्मेदारी के साथ उठाना है।