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राजनीति
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर फिर बोले केशव प्रसाद मौर्य, बयान से सियासी हलचल तेज
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📅 02 Mar 2026, 07:18 PM
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उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर दिया बड़ा बयान। धर्म और राजनीति को लेकर यूपी में फिर गरमाई सियासत, जानें पूरा मामला।
उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर दिया बड़ा बयान। धर्म और राजनीति को लेकर यूपी में फिर गरमाई सियासत, जानें पूरा मामला।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक हस्तियों को लेकर बयानबाज़ी का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसी कड़ी में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने एक बार फिर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर टिप्पणी की है, जिसके बाद राजनीतिक और धार्मिक हलकों में नई चर्चा छिड़ गई है।
उपमुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा कि धर्म और राजनीति की सीमाओं को समझना आवश्यक है। उन्होंने संकेत दिया कि धार्मिक पद पर आसीन लोगों को राजनीतिक टिप्पणी करते समय संयम बरतना चाहिए। उनके इस बयान को सीधे तौर पर शंकराचार्य के हालिया वक्तव्यों से जोड़कर देखा जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
हाल के दिनों में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कुछ राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी थी। उन्होंने सरकार की नीतियों और कुछ प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाए थे। शंकराचार्य का कहना था कि जनहित और धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप फैसले होने चाहिए।
इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि लोकतंत्र में हर किसी को बोलने का अधिकार है, लेकिन धार्मिक पद की गरिमा भी बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार जनता के हित में काम कर रही है और किसी भी प्रकार की गलतफहमी फैलाने की कोशिशों का जवाब तथ्यों के आधार पर दिया जाएगा।
सियासी मायने क्या हैं?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान ऐसे समय आया है जब प्रदेश में कई मुद्दों पर बहस जारी है। धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक नेतृत्व के बीच इस प्रकार की बयानबाज़ी से माहौल गर्म होना स्वाभाविक है।
विपक्षी दलों ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार को आलोचना को सहन करने की आदत डालनी चाहिए। वहीं सत्तारूढ़ दल के नेताओं का कहना है कि कुछ लोग जानबूझकर धार्मिक मंच से राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं।
धर्म और राजनीति का संगम
उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म का प्रभाव हमेशा से रहा है। बड़े धार्मिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की राय का सामाजिक और राजनीतिक असर होता है। ऐसे में जब कोई शंकराचार्य किसी मुद्दे पर टिप्पणी करते हैं, तो उसका व्यापक प्रभाव पड़ता है।
हालांकि, कई वरिष्ठ संतों का मानना है कि धार्मिक पद की गरिमा सर्वोपरि होनी चाहिए और विवादों से दूरी बनाए रखना ही बेहतर है। दूसरी ओर, कुछ धर्मगुरु यह भी तर्क देते हैं कि जब मुद्दा समाज और राष्ट्रहित का हो, तो मौन रहना उचित नहीं।
आगे क्या?
फिलहाल दोनों पक्षों की ओर से बयानबाज़ी जारी है, लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मामला आगे किस दिशा में जाता है। क्या यह विवाद यहीं थमेगा या आने वाले दिनों में और तीखा रूप लेगा — इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ऐसे मुद्दे अक्सर चुनावी माहौल में ज्यादा उछलते हैं। हालांकि अभी चुनाव दूर हैं, लेकिन राजनीतिक तापमान धीरे-धीरे बढ़ता दिखाई दे रहा है।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक हस्तियों को लेकर बयानबाज़ी का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसी कड़ी में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने एक बार फिर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर टिप्पणी की है, जिसके बाद राजनीतिक और धार्मिक हलकों में नई चर्चा छिड़ गई है।
उपमुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा कि धर्म और राजनीति की सीमाओं को समझना आवश्यक है। उन्होंने संकेत दिया कि धार्मिक पद पर आसीन लोगों को राजनीतिक टिप्पणी करते समय संयम बरतना चाहिए। उनके इस बयान को सीधे तौर पर शंकराचार्य के हालिया वक्तव्यों से जोड़कर देखा जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
हाल के दिनों में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कुछ राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी थी। उन्होंने सरकार की नीतियों और कुछ प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाए थे। शंकराचार्य का कहना था कि जनहित और धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप फैसले होने चाहिए।
इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि लोकतंत्र में हर किसी को बोलने का अधिकार है, लेकिन धार्मिक पद की गरिमा भी बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार जनता के हित में काम कर रही है और किसी भी प्रकार की गलतफहमी फैलाने की कोशिशों का जवाब तथ्यों के आधार पर दिया जाएगा।
सियासी मायने क्या हैं?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान ऐसे समय आया है जब प्रदेश में कई मुद्दों पर बहस जारी है। धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक नेतृत्व के बीच इस प्रकार की बयानबाज़ी से माहौल गर्म होना स्वाभाविक है।
विपक्षी दलों ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार को आलोचना को सहन करने की आदत डालनी चाहिए। वहीं सत्तारूढ़ दल के नेताओं का कहना है कि कुछ लोग जानबूझकर धार्मिक मंच से राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं।
धर्म और राजनीति का संगम
उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म का प्रभाव हमेशा से रहा है। बड़े धार्मिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की राय का सामाजिक और राजनीतिक असर होता है। ऐसे में जब कोई शंकराचार्य किसी मुद्दे पर टिप्पणी करते हैं, तो उसका व्यापक प्रभाव पड़ता है।
हालांकि, कई वरिष्ठ संतों का मानना है कि धार्मिक पद की गरिमा सर्वोपरि होनी चाहिए और विवादों से दूरी बनाए रखना ही बेहतर है। दूसरी ओर, कुछ धर्मगुरु यह भी तर्क देते हैं कि जब मुद्दा समाज और राष्ट्रहित का हो, तो मौन रहना उचित नहीं।
आगे क्या?
फिलहाल दोनों पक्षों की ओर से बयानबाज़ी जारी है, लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मामला आगे किस दिशा में जाता है। क्या यह विवाद यहीं थमेगा या आने वाले दिनों में और तीखा रूप लेगा — इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ऐसे मुद्दे अक्सर चुनावी माहौल में ज्यादा उछलते हैं। हालांकि अभी चुनाव दूर हैं, लेकिन राजनीतिक तापमान धीरे-धीरे बढ़ता दिखाई दे रहा है।