केंद्र और राज्य सरकारें इन दिनों पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानूनों का दम भर रही हैं। करोड़ों रुपये के जुर्माने, लंबी कैद और कठोर कार्रवाई के वादों के बीच छात्रों को भरोसा दिलाया जा रहा है कि अब नकल माफिया की खैर नहीं। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सख्ती हर आरोपी पर समान रूप से लागू होगी? विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ नेताओं पर भी अतीत में पेपर लीक से जुड़े मामले दर्ज हुए, जिनमें सुभासपा विधायक बेदी राम और निषाद पार्टी विधायक विपुल दुबे के नाम भी सामने आए। इन मामलों पर न्यायिक प्रक्रिया चल रही है और अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है। यही वजह है कि छात्र और विपक्ष सरकार से पूछ रहे हैं कि यदि पेपर लीक के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति है, तो वर्षों पुराने लंबित मामलों का शीघ्र निस्तारण क्यों नहीं कराया जाता? क्या नए कानूनों की असली परीक्षा पुराने मामलों में भी होगी, या उनका प्रभाव केवल भविष्य के अपराधों तक सीमित रहेगा? सरकार का कहना है कि कानून सभी के लिए बराबर है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। वहीं आलोचकों का तर्क है कि कानून की विश्वसनीयता तभी मजबूत होगी, जब कार्रवाई राजनीतिक पहचान से ऊपर उठकर समान रूप से होती दिखाई दे। देश का युवा आज केवल सख्त कानून नहीं, बल्कि निष्पक्ष और समान कार्रवाई देखना चाहता है। क्योंकि कानून की सबसे बड़ी ताकत उसकी कठोरता नहीं, बल्कि उसका निष्पक्ष लागू होना है।